शनिवार, 23 मई 2015

बखिया उधेड़- फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स


                  
           



(1)    अगर सिर्फ दर्शकों की तालियां ही किसी फिल्म की सफलता का पैमाना है तो फिर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स सफल फिल्मों में शुमार है।
(2)    अगर फिल्म की कहानी में दम न हो और उसमें जबरदस्ती ऑक्सीजन चैंबर लगाकर जान डालने के लिए पटकथा को कसा जाए तो फिर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स जानदार फिल्म है।
(3)    अगर फिल्में सिर्फ अच्छे डायलॉग की बदौलत चलती हैं, पंच लाइन की भरमार की बदौलत चलती हैं तो तो फिर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स बेहतरीन है।
(4)    अगर सिर्फ अभिनय के आधार पर फिल्में चलती हैं तो फिर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स शानदार फिल्म है।
(5)    अगर फिल्म में देश, काल और समाज की चिंता न की जाए और दर्शकों का मनोरंजन करना ही एकमात्र उद्देश्य है तो फिर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स भरपूर मनोरंजन करने वाली फिल्म है।
(6)    और अगर फिल्मों में पटकथा के हिसाब से समय और समाज को तोड़ मरोड़कर पेश करने की आज़ादी है तो फिर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स फिल्म में कोई कमी नहीं है।
ऐसे अगर और भी हो सकते हैं। लेकिन फिलहाल इतना ही। अब जबकि फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स की चतुर्दिक वाहवाही हो रही है, ऐसे में धारा के विपरीत एक कदम भी चलना ख़तरे से खाली नहीं है। पर कोई बात नहीं। एक आम दर्शक के नाते जो मुझे समझ में आया वो मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूं।
ऊपर जितनी भी बातें लिखी हैं वो सब असल में फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स की खासियत हैं। पर सब के साथ अगर जुड़ा है। फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स एक पति-पत्नी की ऐसी कहानी है जो महज चार साल में एक दूसरे से ऊब चुके हैं और मामूली आपसी झड़के को तिल का ताड़ बना देते हैं। मामला एक दूसरे से सम्बन्ध तोड़ने की नौबत तक आ जाता है। लेकिन भारतीय परंपराओं का निर्बाह करते हुए पति-पत्नी फिर से एक दूसरे के हो जाते हैं। इसी कहानी को बताने के लिए निर्देशक आनंद राय ने अपने होनहार लेखक हिमांशु से ताना-बाना बुनवाया और इरोज़ ने उसको बाज़ार में बड़े हाहाकारी तरीके से उतारा।
फिल्म की शुरूआत तो शोमैन राजकपूर साहब की याद के साथ होती है। लेकिन उसके तुरंत बाद आपसी संबंधों से त्रस्त पति-पत्नी एक दूसरे की बखिया उधेड़ते हुए नज़र आते हैं। इस पूरे सीन के दौरान कई ऐसे ठेठ शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है जो दर्शकों के लिए नया और मज़ेदार लगता है। पर साथ में यह दिखाने की कोशिश होती है कि एक स्मॉल टाउन की लड़की किस तरह अपने पति को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। शुरुआती सीन में ही कानपुर की एक लड़की अपने पति को पागल खाने में बंद कराकर खुश होती है और ज़िंदगी को रंगीन बनाने के लिए लंदन से सीधा कानपुर आ जाती है। कानपुर आने के दौरान एक पत्नी को अपने पागल पति पर तरस भी आता है और वो उसे पागलखाने से निकालने का इंतज़ाम भी करती है। यहां तक तो आपका हाजमा ठीक रहता है पर जैसे ही पति बाहर निकलता है और वो अपनी पत्नी को घृणा करने वाला मैसेज देता है, बस उसके बाद तो मानों पत्नी तनु के पैरों में जैसे पहिया लग जाता है। मस्तमौला तनु अपनी मस्ती का सामान ढूंढने लगती है। पुराने सारे मित्रों के यहां जाती है लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कोई नहीं मिलता जो उसकी प्यासी आत्मा को तृप्त कर सके। अंत में कानपुर में रहने वाला उसका पुराना प्रेमी और धोड़ी चढ़ने के बाद भी शादी से वंचित रह जाने वाला ठेकेदार राजा अवस्थी मिलता है। हालांकि राजा अवस्थी अपने पहले ही सीन में साफ करता है कि उसकी शादी तय हो चुकी है। लेकिन अफसोस शादी कानपुर में नहीं, यूपी में नहीं बल्कि हरियाणा के झज्झर में जाट लड़की से तय हुई है। दूर के ऐसे कौन से रिश्तेदार थे उस जाट लड़की के, जो अपनी बेटी का हाथ दूसरे गोत्र में नहीं बल्कि दूसरे राज्य में अवस्थी परिवार में देने को राजी हो गए। बहरहाल, लंदन से अपने पति को दो कौड़ी का साबित कर कानपुर आने वाली तनु राजा अवस्थी के साथ घूमने लगी। राजा अवस्थी को भी लगा आती हुई लड़की वो भी पूर्व प्रेमिका को हाथ से जाने क्यों दिया जाए। दोनों मिलने जुलने लगे, फिल्में साथ देखने लगे।
इसी दौरान दिल्ली लौटे और तनु के हमले से टूटे दिल लिए डॉक्टर मनु को तनु की हमशक्ल लड़की दिख गई। कहते हैं प्यार अंधा होता है पर आकर्षण कई बार जानलेवा होता है। डॉक्टर मनु ने भी वही किया जो तनु ने उनके साथ किया। वो तनु की हमशक्ल लड़की कोमल का पीछा करने लगते हैं। अभी जबकि तलाक पर कोर्ट का मुहर तक नहीं लगता, महज दोनों तरफ से एक-एक नोटिस का आदान-प्रदान किया गया, डॉ मनु शर्मा हमशक्ल लड़की कोमल के घर हाथ मांगने पहुंच जाते हैं। कोमल का भाई प्रेम विवाह के पक्ष में रहता है पर उसके ज़ेहन में एक बार भी नहीं आता कि उसकी बहन बीस साल की और उसका जीजा चालीस साल का है। जाट को प्रगतिशील दिखाना अच्छी बात है पर इतना मत दिखाओं की पीकू की याद ताज़ा हो जाए।
फिल्म में अपने अभिनय से दर्शकों को बांधे रखने वाले दीपक डोभरियाल का एकतरफा प्रेम कई सवाल उठाता है। ऐसा लगता है दीपक के प्रेम को जबरन ठेल ठालकर पंजाब पहुंचाया गया ताकि स्वरा भास्कर और कोमल का आमना-सामना हो सके। क्योंकि जिस तरह से दीपक अपनी प्रेमिका को भगाकर ले जाते हैं उसके बाद न तो प्रेमिका दिखती है और न ही उसके प्रति दीपक का कोई लगाव। समझ में नहीं आया कि बाद में वो लड़की एक प्लेट में खाना किस मुंह से खा रही थी जबकि उसका भाई झज्झर काफी पहले आ चुका था।
मज़ेदार बात ये है कि एक तरफ कोमल के गांव में अब भी संकीर्ण समाज दिखाई देता है लेकिन पहले तो अपने घर में भगाकर एक लड़की को लेकर आई उसके बारे में कोई नोटिस नहीं करता। और बाद में उसके भाई के एक जबदस्त लेक्चर से सारा समाज एकदम से प्रगतिशील हो जाता है। और तो और गांव में एक लड़की आधी रात को सरेआम शराब के ग्लास के साथ घूम रही है। आधी रात को अपनी किस्मत जानने के लिए एक बंगाली बाबा को भी नींद से जगा देती है और उसी समय एक पार्लर को भी खुलवा देती है, लेकिन पूरे गांव में उसे कोई कुछ नहीं बोलता। अगर इतनी तेजी से समाज बदलने लगा तो देश न जाने कितना तरक्की कर जाता।
खैर, अपनी बेटी का परिवार उजड़ते तनु के मां-बाप सरेआम देख रहे हैं, सिर्फ देख ही नहीं रहे हैं बल्कि मज़े ले रहे हैं, दावतें उड़ा रहे हैं पर उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं। वाह, ऐसा न तो छोटे शहरों में होता है और न ही बड़े शहरों में। लेकिन कहा जाता है फिल्मों में सब तरह की आज़ादी है।   
कोमल के त्याग को बड़ा दिखाने के चक्कर में आनंद राय ने शादी की संस्था को दो कौड़ी का साबित कर दिया। शादी के दौरान छह फेरों तक पति-पत्नी के बीच लिए गए सारे वचन बिना मतलब के हैं। अगर सातवां ले लिया तब तो फिर लक्ष्मण रेखा खींच जाएगी। या तो जीवन में सभी सातों फेरों का मतलब है या फिर किसी का नहीं। छह फेरों के बाद भी शादी के पाक रिश्ते को बेकार करार दिया जा सकता है, फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स ने साबित कर दिया।
सब को मालूम है दर्शक को न तो इतनी गहराई में जाना है और न ही दर्शक इसके लिए इतना कष्ट उठाता है। एक बार फिर से सफल और सार्थक फिल्मों को लेकर मेरे दिमाग में बहस छिड़ गई है।
फिल्म की जान है कंगना का अभियन। पहला हाफ दीपक डोभरियाल का है तो दूसरा हाफ कंगना है। लेकिन पूरी फिल्म में कंगना छाई हुई है। कहानी के हिसाब से पहला हाफ काफी अच्छा है, मनोरंजन और डायलॉग दोनों हैं। पर दूसरा हाफ कहानी के फ्लो को थोड़ा रोकता है।
यह तय है कि फिल्म बिजनेस के लिहाज से काफी सफल रहेगी पर जहां तक राजकुमार हिरानी के फिल्मों से तुलना की जाए तो आनंद राय अभी बहुत पीछे हैं। राजू का तरीका मनोरंजन के साथ एक संदेश देने का रहता है इसलिए कहानी में भी दम रहता है। कहानी, पटकथा और संवाद तीनों का जो अद्भुत संगम वहां दिखता है वो मेरे हिसाब से आनंद राय में फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में मिसिंग है।
(बखिया उधेड़ किसी हीन भावना से ग्रसित होकर नहीं लिखी गई है। उद्देश्य है अन्य सवालों से आपको रू-ब-रू कराने का।)



शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

तेरी महिमा अपरमपार....


मोदी एक अहंकार अनेक...

मोदी का लच्क्षेदार भाषण सुनने का सुअवसर मिला...बड़ा अफसोस हुआ....पीएम मोदी अपने स्टार प्रचारक वाले कैरेक्टर से निकल ही नहीं पा रहे हैं...फिल्म का चस्का तो है ही मोदी जी को..तभी तो स्टार्स की भीड़ लगी रहती है... मोदी जी सेल्फी बड़े चाव से खींचते हैं उनके साथ...

खैर, आदमी तो आदमी ही है न...मोदी जी आम चुनाव की कैंपेनिंग के कैरेक्टर से निकल ही नहीं पा रहे हैं...अब भी कांग्रेस को पानी पी पी कर गाली दे रहे हैं और वो भी कहां, संसद में...जहां कांग्रेस धूल में पड़ी है...पर चक्कर ये है कि मोदी जी बोले क्या???...इसके अलावा कुछ है भी तो नहीं...

मनरेगा की बात का जिस तरह से उन्होंने जिक्र किया उससे दिल को बड़ी ठेस पहुंची...मनरेगा का वो गाजे बाजे के साथ सिर्फ इसलिए रखेंगे क्योंकि उन्हें लोगों को ये बताना है कि देखो कांग्रेस ने क्या किया है तुम्हारे साथ...अरे भई...अगर उसका कोई काम नहीं तो हज़ारों करोड रुपए क्यों खर्च करोगे????इससे किसी मोटा भाई को फायदा हो रहा है इसलिए उसे बनाए रखोगे...??? ऐसा क्यो करतें हैं पीएम साहब...आप पीएम हैं....

60 महीने लोगों ने दिए हैं...तय कर लो कांग्रेस को सिर्फ गिराना है या काम भी करना है...नए नए सिर्फ जुमले देने है...कहां चला गया स्वच्छ भारत अभियान...निकल गई हवा...जनता बेवकूफ नहीं है....वक्त आने पर किसी का भी अहंकार तोड़ने का दम रखती है...बचना पड़ेगा आप को भी पीएम साहब...

गैर सांप्रदायिक, नौ महीने में देश का दिल गवां देने वाले, गरीबों के भरपेट भोजन देने वाले, देश को चमका देने वाले (स्वच्छ कर देने वाले) नेता की जय हो...खुद जमकर जीओ और दूसरों को जीने का भरपूर सपना दिखाओ...बाबा तेरी कृपा बनी रहे...।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

डिंगमार राजनीति का डंका





डिंगमार राजनीति का डंका तो प्रधानमंत्री मोदी और उनके अर्जुन और बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह तो ऐसे बजाते हैं जैसे न भूतो न भविष्यति। अभी पिछले दिनों दिल्ली के चुनावी सभा में अमित शाह ने मोदी की मौजूदगी में कहा कि देश में 1500-4500 रुपए तक महंगाई कम हो गई है। मैंने सोचा क्या जनता को इस बात का अंदाजा है कि महंगाई कम हो गई है। दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट से पेट्रोल और डीजल के दाम भारत में भी कम हुए तो लगा अब महंगाई कम होगी। हमारी जेबों को थोड़ी राहत मिलेगी, लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं। या तो अमित शाह और मोदी के आंख-कान हैं वो उन्हें गुमराह करते हैं या फिर डिंग मारने की पुरानी आदतों से दोनों बाज नहीं आते। अरे भाई! अगर महंगाई कम होती तो क्या हमें पता नहीं चलता। पता नहीं ये महंगाई हमेशा कागज़ों पर ही क्यों कम होती है। आम लोगों के चेहरों पर जो तनाव है उसमें कमी क्यों नहीं आती। सब्जियां अब भी उसी कीमत पर मिल रही है, दूध, फल से लेकर खाने पीने की हर चीज़ की कीमत में महंगाई कम होने का कोई असर नहीं आया। फिर महंगाई कहां कम हुई। इस देश का दुर्भाग्य है जनता गुमराह होती है और नेता उसपर मलाई खाते हैं। 

'बीजेपी के लिए राहुल गाँधी साबित होंगी किरण बेदी' (Kiran Bedi is going to be Rahul Gandhi for BJP in Delhi)






दिल्ली चुनाव भले ही बीजेपी के लिए आन बान और शान का सबब बना हो। पर लगता है ड्राइविंग सीट पर किरण बेदी को बिठाकर बीजेपी ने अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार ली है। अब चूंकि मामला हाथ से निकल चुका है इसलिए बीजेपी के लिए गले की हड्डी साबित हो गई हैं किरण बेदी। उगलने का तो सवाल ही नहीं और निगलने के अलावा कोई चारा नहीं है। ऐसा माना जा रहा है कि आईबी की रिपोर्ट ने बीजेपी की आँखें खोल दी हैं। अखबारों की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की जनता मोदी को पसंद तो कर रही है लेकिन बेदी पर भरोसा करने से कतरा रही है। यही ख़तरा संघ को भी था। संघ भी अबतक किरण बेदी पर भरोसा नहीं कर पा रही है। अब मोदी के इस फैसले को बदलने का न तो समय है और न ही कोई समझदारी है। देखने की ज़रूरत ये है कि किरण के सामने किस-किस के ख़तरे हैं---
(1) किरण बेदी का रूख नेताओं जैसा नहीं अफसर जैसा है। उनका पूरा हाव-भाव अब भी अपसरों जैसा है जबकि राजनीति में अफसर जैसा रौब नहीं बल्कि सरलता और सहजता ज़रूरी है और आम जनता जबतक खुद को उस अमुक नेता से जोड़ नहीं पाती, वोट देने में हिचकिचाती है।  
(2) किरण न तो वक्ता अच्छी हैं और न ही नेताओं जैसी समझ है---एक तरफ मोदी अपने वाक चातुर्य की तारीफ करते नहीं थकते वहीं दूसरी तरफ ऐसी नेता को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित कुिया है जो डिबेट तो दूर सामान्य बातों को भी सहजता से नहीं रख पाती हैं। ऐसे में जनता को समझ में आता है कि जब वो अपनी बात नहीं रख पा रही हैं तो उनकी बातें कैसा रख पाएंगी।
(3) संघ का ऊपरी समर्थन-मोदी भले ही दिल्ली चुनाव को इज्ज़त का अखाड़ा मान रहे हों पर संघ और उसके खांटी कैडर किरण को समर्थन देने में सुख का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं। हालत तो ये भी है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार भी खुलकर किरण की तरफदारी नहीं की। उनकी किसी बात से ये समझ नहीं आता कि किरण को वो सपोर्ट कर रहे हैं।
(4) दिल्ली बीजेपी के पुराने नेता नाराज़-दिल्ली बीजेपी के पुराने नेता किरण बेदी को आयातित करने से नाराज़ हैं। उनकी नाराज़गी जायज़ भी है। ऐसे में अगर नेता नाराज़ हैं तो उनके कार्यकर्ता भी नाराज़ हैं। कार्यकर्ताओं का तो ये भी कहना है कि अगर किरण की जगह डॉ हर्षवर्धन ही होते तो आज तस्वीर अलग होती।
(5) इनके अलावा सबसे बड़ी बात ये है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी का जनाधार अब भी बरकरार है। अरविंद केजरीवाल के भगोड़ेपन को बीजेपी ने भले ही रोज़-रोज़ सैंकड़ों बार कहा हो पर जनता पर उसका असर उतना नहीं पड़ रहा है। ग़रीब जनता आज भी अरविंद के साथ है। पढ़़े लिखे लोग भी अरविंद के साथ हैं। ऐसे में जो अरविंद के साथ नहीं हैं वो हैं वैश्य समाज के लोग। पर बीजेपी के आज के ताज़ा कार्टून(जिसमें अग्रवाल गोत्र को उपद्रवी कहा गया) से कुछ वोटर अरविंद से जुड़े होंगे इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

ऐसे में अगर बीजेपी दिल्ली में सरकार नहीं बना पाती है तो उसका ठीकरा किरण बेदी पर ही फूटेगा। लेकिन उसके बाद किरण बेदी की क्या हैसियत रह जाएगी पार्टी में, इसका अंदाजा लगाना काफी मुश्किल है।




सोमवार, 30 सितंबर 2013

एकाकीपन से ऊबरने की कोशिश- लंच बॉक्स


           
युवा फिल्मकार रितेश बत्रा की बहुचर्चित और अत्यंत प्रशंसनीय फिल्म द लंच बॉक्सवाकई दिल को छू लेने में कामयाब होती है। फिल्म को देखते हुए प्रसिद्ध कहानीकार निर्मल वर्मा की कहानियां बार-बार याद आईं।  
फिल्म के एक साथ कम से कम चार पांच पात्र अपनी कहानी अलग-अलग अंदाज में कह रहे होते हैं, लेकिन सबमें एक सामान्य स्वर उभरता है एकाकीपन ।
पहला अहम किरदार हैं इरफान खान---एक ऐसा कलर्क जो समय से पहले नौकरी से रिटायरमेंट लेने की तैयारी में हैं। पत्नी की मौत के बाद से नितांत अकेले। उसकी ज़िंदगी में सबकुछ एक रटी रटाई लीक पर रेंग रही है। पिछले पैंतीस सालों से ऑफिस में रोज़ घंटों हिसाब किताब करना...कैलकुलेटर पर लगातार ऊंगलियां नचाना..डेढ़ बजते ही खाने का लंच बॉक्स उठाना और पांच बजते-बजते घर के लिए निकल जाना। लोकल में धक्के खाकर घर पहुंचना...घर के पास क्रिकेट खेल रहे बच्चों को फटकारना और फिर रात में सामने के पड़ोसी की खिड़की से भरे पूरे परिवार को एक साथ खाना खाते देखना...रस्क करना और अकेलेपन को सिगरेट के धुंए में उड़ा देना....न तो इससे कुछ ज्यादा और न ही इससे कुछ कम। इन सबमें जो सबसे ज्यादा साथ निभाता है वो है एकाकीपन। जैसे ही नायक के जीवन में ज़िंदगी की हल्की सी मुस्कान आती है उसके चेहरे पर हंसी छलकने लगती है। चिट्ठी पढ़कर खुश होने लगता है। लंच बॉक्स का इंतजार करने लगता है।
फिल्म की दूसरी अहम किरदार है नायिका निमरत कौर। लगभग दस साल की बेटी की मां। जिसका पति महंगाई की मार से घर को बचाने के लिए दिनरात काम करता है। मतलब ये कि पति को कई बार घर से रात में अचानकर ऑफिस के काम से जाना पड़ जाता है। इन सबसे में जो सबसे ज्यादा मिसिंग है वो है पति और पत्नी के बीच में बातचीत न होना...प्यार की कमी। कुल मिलाकर अकेलापन और एकाकीपन निमरत कौर की ज़िंदगी का अहम हिस्सा है। पति के कपड़ों को सुंघकर तृप्त होना और उन्हीं कपड़ों से ये अंदाजा लगा लेना कि उसके पति का किसी से अवैध सम्बन्ध है। लेकिन लंच बॉक्स के जरिए जब उसकी ज़िंदगी लौटने लगी तो उसने अपने सारे गहने तक बेच डाले और सुख की तलाश में दूर निकलने के लिए तत्पर दिखी। बिना इस बात की परवाह किए कि ज़माना क्या कहेगा और क्या होगा। खुशी की तलाश हर किसी को है इस फिल्म में।
फिल्म का तीसरा अहम किरदार है एक अदृश्य महिला---जिसे पूरी फिल्म में एक बार भी नहीं दिखाया गया पर उसकी ज़िंदगी को बार-बार सामने रखा गया। महिला लगातार निरमत कौर से बात करती है और रस्सी में बंधी डलिया से रोजमर्रा के जीवन की उपयोगी चीजों का आदान-प्रदान होता है। उनकी बातों से ही हम जानते हैं कि उसका पति लंबे समय से बीमार है और असहाय भी है। व्यक्तिगत जीवन में इतने बड़े संकट के बावजूद वह महिला नायिका को उत्साह दिलाती है, उसके जीवन में आशा का संचार करती है। यह एक अदृश्य सूत्रधार की भूमिका की तरह ही है। दरअसल, फिल्म की तरह यह भूमिका भी अपरिभाषित है। हम सबके जीवन में भी कोई एक अदृश्य व्यक्ति होता है। वह हमारे अपने अवचेतन की रचना होती है। फिल्म में भी कदाचित फिल्मकार का आशय यह है कि यह पात्र नायिका का अवचेतन ही है। दोनों पड़ोसियों में एक समानता भी है कि एक का पति लंबे समय से बीमार लेटा है और दूसरी के पति के पास अपनी पत्नी के लिए वक्त ही नहीं है। यहां तक कि वह उसे देखकर भी नहीं देख रहा है, जैसा हम उस दृश्य में देखते हैं, जिसमें पत्नी ने वह पोशाक पहनी है जिसे पहनकर वह हनीमून पर गई थी। लेकिन वो अदृश्य महिला कहती है कि उसने चलते पंखे की सफाई की...निर्देशक का आशय साफ है ज़िंदगी को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी है...खुशी के लिए जद्दोजहद जारी है।   
फिल्म का चौथा अहम किरदार है नवाजुद्दीन सिद्दिकी---जो बार-बार कहता है कि वो अनाथ है। पर साथ में ये भी ठोक कर यकीन दिलाता है कि अकेले ज़िंदगी जी कर उसने हर मुकाम खुद से पाया है। और तो और जब इमरान खान ट्रेनिंग के लिए टाल मटोल करता है तो मजबूत इरादा दिखाता है और स्वाभिमान से कहता है कि वो सारा काम खुद ही सीख लेगा। नवाजुद्दीन के व्यक्तित्व से ये भी जाहिर है कि वो किसी बात के लिए शर्म नहीं करता। मौके की तलाश में रहता है और ज़िंदगी को अकेलेपन में उलझाना नहीं चाहता। उसे पता है कि झूठ बोलने से दिक्कत हो सकती है फिर भी परवाह नहीं करता। अपनी प्रेमिका से रोज़ मिलता है फिर भी अपने सीनियर यानि फिल्म के नायक को घर बुलाता है खाने पर और उसे साफ-साफ कहता है कि ज़रूरत पड़ने पर उसे परिवार का हिस्सा बनना पड़ेगा। कहने की कोशिश ये है कि अकेलेपन से ऊबरा ज़रूरी है...अपने सीनियर को बार-बार कहता है कि अगर वो रिटायरमेंट नहीं लेंगे तो उसके लिए काफी अच्छा रहेगा।   
फिल्म की एक और किरदार है अभिनेत्री की मां---जो अपने पति के साथ रहकर उससे प्यार नहीं बल्कि बहुत ज्यादा घृणा करती है। वर्षों से लगातार एक ही तरह की ज़िंदगी जीते-जीते वो तंग आ चुकी है। इसलिए वो अपने पति की मौत पर वो आंसू नहीं बहाती है बल्कि बेटी से पूछती है किस रंग का एंबुलेंस आया है और उसपर बत्ती कौन सी लगी है...(जिंदगी की एकरसता को तोड़ने की कोशिश) वो बार-बार कहती है कि उसे बहुत भूख लगी है। बेटी इस बात पर झेंपती भी है मां को चुप करने की कोशिश भी करती है लेकिन सच ये है कि दवाई खरीदने के लिए टीवी तक बेच देने वाली महिला को पता है कि दरअसल खाने की अहमियत क्या है और भूख किस बला का नाम है।
फिल्म में एक सीन के लिए एक और किरदार आया है एक बुजुर्ग जो ट्रेन से नासिक जा रहा है। बुजुर्ग इरफान से पूछता है कि वो हमेशा के लिए नासिक जा रहा है..इसपर इरफान हां में जवाब देता है....इरफान के जवाब में वो खुद ही कहता है कि दरअसल वो भी नासिक में रहता है पर कभी कभार मुंबई आता है दवाई लेने, बेटे के पास। ये बात इरफान को मानों झकझोर देती है।
लंच बॉक्स के किरदारों के जरिए रितेश बत्रा ने फिल्म को एक घागे से पिरोने की कोशिश की है। एकाकीपन महानगरों का स्थायीभाव है। इसी एकाकीपन को दूर करने की कोशिश है लंच बॉक्स। इस एकाकीपन को दूर करने के लिए रितेश ने डब्बा वाले के बहाने एक अपिभाषित प्रेम कहानी बनाने की चेष्टा की। एक ऐसी प्रेम कहानी जो डब्बा के बहाने दो लोगों की ज़िंदगी में हंसने का बहाना बन सके। डब्बे का पति के पास न पहुंचना और उसका एक दूसरे पते पर पहुंच जाना महज इत्तेफाक है। पर इसके बहाने निर्देशक ने दोनों के बीच जो प्रेम पत्र का आदान-प्रदान किया है वो दिल को छू लेने वाला है। पत्र में सिर्फ प्यार नहीं बल्कि वो सारी बातें हैं जो समाज में घटिच हो रही हैं। एक महिला का अपनी बच्ची के साथ छत से कूदकर जान देने से लेकर पड़ोसी के पंखे और उनके पति के कोमा में होने की बातें भी हैं। दोनों को पत्र का इंतजार रहता है। पत्र के जरिए दोनों एक दूसरे से कहते हैं कि भूटान एक ऐसा देश है जहां कोई दुखी नहीं रहता। मतलब साफ है बाज़ारवाद और भूमंडलीकरण के इस दौर में सुखी रहने की तमाम कोशिशें और उससे टकराते मनुष्य को इस फिल्म का केंद्रीय विषय बनाया गया है।   
प्रेम की एक हल्की सी उम्मीद ही इस फिल्म की जान है, जो निमरत और इरफान के चेहरे पर हंसी की लकीर लाने में कामयाब होती है। लेकिन इस प्रेम को निर्देशक ने पूरा होते फिल्म में नहीं दिखाया है। और तो और दोनों एक दूसरे से मिल सकते थे, लेकिन ऐसी नहीं हुआ। शुरुआती तौर पर उम्र के फासले को आड़ बनाया गया। पर जब फिल्म खत्म होने लगती है उस समय नायिका भूटान जाने के लिए इरफान को आमंत्रण दे देती है। भूटान जाने के लिए उसने अपने मंगलसूत्र तक बेच डाले। वो इरफान को ढ़ूंढने के लिए उसके ऑफिस तक जाती है पर उसे निराशा हाथ लगती है। उधर इरफान नासिक न जाकर मुंबई वापस लौट जाता है और उन तमाम ठिकानों पर जाता है जहां से निरमत के बारे में जानकारी मिल सके। फिल्म यहीं खत्म हो जाती है। फिल्म के खत्म होने के बाद दर्शकों को ऐसा लगता है कि कुछ अनकहा सा रह गया और शायद अंत कुछ और होता। पर सच तो यह है कि अगर अंत दोनों के मिलन से होता तो फिर वही पुरानी लीक नज़र आने लगती।  
 




रविवार, 12 मई 2013

मंगलवार, 7 अगस्त 2012